

बागेश्वर(आरएनएस)। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा के ईआईएसीपी केंद्र ने बागेश्वर जिले में स्थित पिंडारी ग्लेशियर क्षेत्र का पर्यावरणीय सर्वेक्षण किया है। इसका उद्देश्य ग्लेशियर के पीछे खिसकने, भू-क्षरण और जैव विविधता पर पड़ रहे प्रभावों का आकलन करना है। सर्वेक्षण दल में डॉ. महेशानंद, डॉ. रविंद्र जोशी, इंजीनियर कमल टम्टा, हेम तिवारी और मनीष शामिल रहे। सर्वेक्षण के दौरान स्थानीय लोगों ने बताया कि पिछले कई दशकों से ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहा है, जो जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन का संकेत है। पिंडारी ग्लेशियर से निकलने वाली पिंडर कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाली प्रमुख नदी है, जिसका संगम कर्णप्रयाग में अलकनंदा से होता है। यह गंगा की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है। पर्यावरणीय दृष्टि से यह क्षेत्र बेहद समृद्ध है। यहां भालू, कस्तूरी मृग, भरल, मोनाल, हिमालयी तीतर समेत कई वन्यजीव और बुरांश, बांज, उतीस, किल्मोड़ा, रिंगाल जैसी वनस्पतियां पाई जाती हैं।पिंडारी ग्लेशियर तक पहुंचने के लिए बागेश्वर से खाती तक करीब 50 किमी सड़क मार्ग, इसके बाद खाती-द्वाली (12 किमी), द्वाली-फुरकिया (6 किमी) और फुरकिया से जीरो प्वाइंट तक 8 किमी पैदल यात्रा करनी पड़ती है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में लगातार होने वाली तीव्र वर्षा से भूमि कटाव की समस्या भी बढ़ रही है। भू-क्षरण को रोकने के लिए वन विभाग ने प्राकृतिक आधारित उपायों के तहत कई स्थानों पर नारियल की रस्सियों से बने जाल लगाए हैं, जिससे मृदा संरक्षण और पुनर्स्थापन का प्रयास किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि क्षेत्र की जैव विविधता और प्राकृतिक सुंदरता को देखते हुए पर्यटन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

