
देहरादून। शिक्षक दिवस पर उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की दो बिल्कुल अलग तस्वीरें सामने आईं। एक ओर चमोली जिले के एक विद्यालय में शिक्षक दिवस के दिन दोनों शिक्षक अनुपस्थित मिले, जिससे बच्चों और अभिभावकों को निराशा हाथ लगी। वहीं दूसरी ओर पौड़ी जिले के एक शिक्षक ने अपने नवाचार और समर्पण से राष्ट्रपति के हाथों राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्राप्त कर पूरे प्रदेश को गौरवान्वित किया।
चमोली जिले के ज्योतिर्मठ विकासखंड स्थित राजकीय जूनियर हाईस्कूल भलागांव में शिक्षक दिवस पर बच्चे और अभिभावक कार्यक्रम की उम्मीद लेकर विद्यालय पहुंचे, लेकिन वहां तैनात शिक्षिका रेनू डंगवाल और प्रभारी प्रधानाध्यापक देवेंद्र लाल मौजूद नहीं मिले। दोनों शिक्षकों की अनुपस्थिति से शिक्षण कार्य प्रभावित हुआ और ग्रामीणों में नाराजगी फैल गई।
मामला शिक्षा विभाग तक पहुंचने पर जिला शिक्षा अधिकारी (बेसिक) पंकज उप्रेती ने शिक्षिका रेनू डंगवाल को निलंबित कर दिया। वहीं प्रभारी प्रधानाध्यापक देवेंद्र लाल के संबंध में विभाग को जानकारी मिली कि वे जनगणना ड्यूटी पर थे। इसकी पुष्टि के लिए तहसीलदार से रिपोर्ट तलब की गई है, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
ग्रामीणों का कहना है कि दूरस्थ क्षेत्रों में पहले से ही शिक्षकों की कमी है। ऐसे में दोनों शिक्षकों की अनुपस्थिति से बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ता है। महिला मंगल दल की अध्यक्ष अंजना भट्ट ने कहा कि पहाड़ के विद्यालय पहले ही सीमित संसाधनों में संचालित हो रहे हैं और शिक्षकों की अनियमित उपस्थिति से विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हो रहा है। एक छात्रा ने भी आरोप लगाया कि विद्यालय में अक्सर एक ही शिक्षक आता है, जिससे पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं हो पाता।
इसी शिक्षक दिवस पर उत्तराखंड की दूसरी तस्वीर प्रेरणादायक रही। पौड़ी जिले के नैनीडांडा विकासखंड स्थित राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय मुस्याखांद के प्रधानाध्यापक गबर सिंह बिष्ट को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार-2026 से सम्मानित किया।
वर्ष 2003 से विद्यालय में सेवाएं दे रहे गबर सिंह बिष्ट ने सीमित संसाधनों के बावजूद ग्रामीण विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने गणित और विज्ञान की पढ़ाई को रोचक बनाया तथा विद्यालय में डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देते हुए ई-कंटेंट, प्रोजेक्टर, डिजिटल बोर्ड और ऑनलाइन माध्यमों का प्रभावी उपयोग किया। कोरोना काल में भी उन्होंने विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित नहीं होने दी।
शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें इससे पहले राज्यपाल पुरस्कार और शैलेश मटियानी पुरस्कार भी मिल चुका है। मुख्य शिक्षाधिकारी अत्रेश सयाना ने कहा कि दुर्गम क्षेत्र में रहकर शिक्षा के प्रति उनका समर्पण अन्य शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत है।
शिक्षक दिवस पर सामने आई ये दोनों घटनाएं उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था के दो अलग-अलग पक्षों को उजागर करती हैं। एक ओर शिक्षक की अनुपस्थिति बच्चों की शिक्षा को प्रभावित करती है, वहीं दूसरी ओर समर्पित शिक्षक सीमित संसाधनों में भी विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। यह स्पष्ट करता है कि शिक्षा की गुणवत्ता केवल संसाधनों पर नहीं, बल्कि शिक्षकों की प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी पर भी निर्भर करती है।

