
देहरादून। हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई को लेकर सभी पक्षों की निगाहें टिकी हैं। करीब दो दशक से न्यायालयों में चल रहे इस विवाद में अब सुनवाई महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। मामले को सर्वोच्च न्यायालय में चीफ जस्टिस की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया है, जिससे इस बार सुनवाई होने की संभावना प्रबल मानी जा रही है।
यह मामला केवल रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि दशकों से वहां रह रहे हजारों परिवारों के पुनर्वास, आवास और मानवीय पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक निर्देश पर राज्य सरकार, रेलवे प्रशासन और प्रभावित परिवारों की नजर बनी हुई है।
पिछले दो महीनों के दौरान कई बार सुनवाई की तिथि तय हुई, लेकिन सूची में मामला पीछे होने के कारण सुनवाई नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि रेलवे और उत्तराखंड सरकार ने शीघ्र सुनवाई का आग्रह किया था, जिसके बाद 9 सितंबर की तिथि महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
सुनवाई से पहले राज्य सरकार ने भी तैयारियां तेज कर दी हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ही प्रभावी कानूनी पैरवी के निर्देश दे चुके हैं। केंद्र सरकार, रेलवे और राज्य सरकार की ओर से संयुक्त रूप से अपना पक्ष मजबूती से रखने की तैयारी की गई है। वहीं गृह विभाग ने सुनवाई के दिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिला प्रशासन और पुलिस को अतिरिक्त सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं।
मामले ने जनवरी 2023 में उस समय बड़ा मोड़ लिया था, जब नैनीताल हाईकोर्ट ने रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। इसके बाद प्रभावित परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां सर्वोच्च अदालत ने तत्काल ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए पुनर्वास के मुद्दे पर सुनवाई शुरू की।
इसके बाद 24 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए कहा था कि किसी भी कार्रवाई से पहले प्रभावित परिवारों के पुनर्वास पर गंभीरता से विचार किया जाए। अदालत ने यह भी जानना चाहा था कि रेलवे को वास्तव में कितनी भूमि की आवश्यकता है, कितने परिवार प्रभावित होंगे और उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था की जा सकती है।
रेलवे का लगातार यह पक्ष रहा है कि विवादित भूमि उसकी है और उस पर किया गया कब्जा अवैध है। रेलवे अपने दावे के समर्थन में पुराने अभिलेखों और वर्ष 1959 की भूमि योजना का हवाला देता रहा है। दूसरी ओर प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे कई दशकों से वहां रह रहे हैं, उनके नाम स्थानीय निकायों के अभिलेखों में दर्ज हैं और वे विभिन्न स्थानीय कर भी जमा करते रहे हैं। उनका तर्क है कि पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना उन्हें हटाना न्यायोचित नहीं होगा।
विवादित क्षेत्र में केवल आवास ही नहीं, बल्कि स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य सामाजिक ढांचा भी विकसित हो चुका है। यही कारण है कि मामला केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इससे जुड़े सामाजिक और मानवीय पक्ष भी न्यायालय के विचाराधीन हैं।
बनभूलपुरा रेलवे भूमि विवाद वर्ष 2007 से विभिन्न न्यायालयों में विचाराधीन है। इस दौरान हाईकोर्ट के कई आदेश आए, अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए और अवमानना याचिकाएं भी दायर हुईं, लेकिन विवाद का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। दिसंबर 2022 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां से फिलहाल ध्वस्तीकरण पर रोक लगी हुई है।
अब 9 सितंबर की सुनवाई को इस लंबे विवाद का अहम पड़ाव माना जा रहा है। हालांकि अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही स्पष्ट होगी। ऐसे में प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्क है, जबकि सरकार और रेलवे अपने कानूनी पक्ष को मजबूत करने में जुटे हैं।

