
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विशेष परिस्थितियों में विवाह के दौरान जन्मे बच्चे के पितृत्व की पुष्टि के लिए डीएनए परीक्षण कराया जा सकता है। अदालत ने पति द्वारा लगाए गए बेवफाई के आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए डीएनए टेस्ट को आवश्यक मानते हुए निचली अदालतों के आदेश को बरकरार रखा।
जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने उस महिला की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने डीएनए परीक्षण का विरोध किया था। महिला का तर्क था कि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध डीएनए टेस्ट कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता और तलाक की याचिका पर बिना इस जांच के निर्णय दिया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि पत्नी अपने पति के प्रति वफादार होने का दावा करती है, तो डीएनए परीक्षण का विरोध करने का कारण स्पष्ट होना चाहिए। अदालत ने पुणे की फैमिली कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट के उन आदेशों को सही ठहराया, जिनमें तलाक की कार्यवाही के दौरान बच्चे का डीएनए परीक्षण कराने के निर्देश दिए गए थे।
मामले में पति ने दावा किया था कि पत्नी के कथित विवाहेतर संबंधों को साबित करने के लिए बच्चे के पितृत्व की जांच आवश्यक है। उसने हैदराबाद की एक निजी लैब से कराई गई डीएनए जांच रिपोर्ट भी अदालत में पेश की थी, जिसमें उसके बच्चे का जैविक पिता होने की संभावना शून्य बताई गई थी।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना था कि निजी लैब की रिपोर्ट अदालत की निगरानी में दोबारा डीएनए परीक्षण कराने के लिए पर्याप्त आधार उपलब्ध कराती है। अदालत के अनुसार, पितृत्व का निर्धारण इस विवाद के निष्पक्ष निस्तारण के लिए महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि वैवाहिक विवादों में यदि परिस्थितियां इसकी मांग करती हैं और न्यायहित में आवश्यक हो, तो अदालत पितृत्व की पुष्टि के लिए डीएनए परीक्षण का आदेश दे सकती है। इस निर्णय को पारिवारिक मामलों में डीएनए साक्ष्यों की भूमिका के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


