
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि जरूरत पड़ने पर माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति से बेटे, बहू या अन्य परिजनों को बेदखल करा सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि बढ़ती उम्र किसी भी व्यक्ति के लिए असुरक्षा, अपमान या उत्पीड़न का कारण नहीं बननी चाहिए और हर वरिष्ठ नागरिक को गरिमा व सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि यदि किसी वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और भरण-पोषण सुनिश्चित करने के लिए बेदखली आवश्यक हो, तो संबंधित ट्रिब्यूनल ऐसा आदेश पारित कर सकता है। अदालत ने कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मानजनक व्यवहार करता है।
शीर्ष अदालत ने इस दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें बुजुर्ग माता-पिता की संपत्ति से बेटे और बहू को बेदखल करने संबंधी ट्रिब्यूनल के आदेश को निरस्त कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र की गलत व्याख्या की थी।
मामला लखनऊ निवासी रविकांत गुप्ता से जुड़ा था, जिन्होंने वर्ष 2022 में अपनी स्वयं अर्जित संपत्ति से बेटे को बेदखल करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया था। सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था। एसडीएम ने बेटे की बेदखली का आदेश दिया था, जिसे बाद में जिला मजिस्ट्रेट ने भी बरकरार रखा था। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन आदेशों को रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित ट्रिब्यूनल को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। यदि वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए आवश्यक हो, तो ट्रिब्यूनल संपत्ति से बेदखली का आदेश भी दे सकता है।
पीठ ने अपने फैसले में एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021) सहित अन्य पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य केवल संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा करना नहीं, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों को सुरक्षित, सम्मानजनक और शांतिपूर्ण जीवन उपलब्ध कराना भी है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि बेटे, बहू या अन्य परिजन बुजुर्गों के लिए उत्पीड़न या असुरक्षा का कारण बनते हैं, तो कानून उनके हितों की रक्षा के लिए प्रभावी हस्तक्षेप कर सकता है।


