
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने की सरकार की नीति
नई दिल्ली, 27 मार्च (आरएनएस)। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, भारत अवैध घुसपैठियों की राजधानी नहीं बन सकता। सरकार ने जम्मू में शिविरों में रखे गए 150 से अधिक रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार भेजने से रोक लगाने की मांग वाली याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि रोहिंग्या राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्याओं की रिहाई और उन्हें म्यांमार वापस भेजने के केंद्र के आदेश पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ के समक्ष केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर कर कहा है कि रोहिंग्या पूरी तरह से अवैध घुसपैठिए हैं। छह मार्च को जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने इन घुसपैठियों की पहचान की प्रक्रिया शुरू कर दी है। विदेशी अधिनियम के तहत 150 से अधिक को शिविरों में भेजा गया है। सरकार ने कहा है कि इन लोगों के पास वैध यात्रा दस्तावेज नहीं है। सरकार ने यह भी कहा है कि रोहिंग्या यह दावा नहीं कर सकते कि जीवन जीने का अधिकार के तहत उन्हें भारत में बसने का अधिकार है। वहीं, याचिकाकर्ता मोहम्मद सलीमुल्लाह समेत रोहिंग्याओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने हिरासत में रखे रोहिंग्या लोगों को रिहा कर भारत में ही रहने दिया जाए। भारत में रह रहे सभी रोहिंग्याओं को शरणार्थी का दर्जा दिया जाए। इस बात के कोई सुबूत नहीं हैं कि रोहिंग्या लोग भारत की सुरक्षा को खतरा पहुंचा रहे हैं।
म्यांमार सरकार से पुष्टि के बाद ही भेजेंगे
मेहता ने कहा, भारत की म्यांमार सरकार से बातचीत जारी है। अगर म्यांमार सरकार कहेगी कि ये लोग उनके नागरिक हैं, तभी इन्हें वापस भेजा जाएगा। मेहता ने कहा कि यह राजनयिक मसला है और यह पूरी तरह से विधायिका के दायरे में आता है। वहीं, जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने पीठ को आगाह किया कि अवैध घुसपैठिए से संबंधित मामलों में दखल देने से एक गलत परंपरा स्थापित हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की दलीलों पर कहा कि इसका मतलब यह हुआ कि रोहिंग्या को तभी भेजा किया जाएगा जब म्यांमार उसे स्वीकार करेगा। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने इसका जवाब हां में देते हुए कहा कि सरकार अफगानियों को म्यांमार नहीं भेज सकती।

