
देहरादून(आरएनएस)। संसद में हाल ही में पेश किए गए ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल 2026 के खिलाफ दून में भी ट्रांसजेंडर समुदाय और उनके समर्थकों ने मोर्चा खोल दिया है। रविवार को तिब्बती मार्केट के पास स्थित रेस्त्रां में ट्रांसजेंडर समुदाय और सहयोगी संस्थाओं ने संयुक्त प्रेसवार्ता कर इस बिल को तुरंत वापस लेने की मांग की। समुदाय का कहना है कि यह बिल बिना उनकी राय लिए लाया गया है और यह उनके वर्षों के संघर्ष से मिले अधिकारों को छीनने वाला है। प्रेसवार्ता में ओशिन, मीरा और नैना आदि ने समुदाय का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने 13 मार्च 2026 को लोकसभा में यह बिल पेश किया था। जिसे 23 मार्च को संसद में चर्चा के लिए लाया जाना है। समुदाय ने इसे गरिमा, निजता और पहचान के अस्तित्व पर खतरा बताते हुए चेतावनी दी कि यदि इसे अधिनियम बनने से नहीं रोका गया, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। वक्ताओं ने कहा कि यह संशोधन बिल 2014 के सुप्रीम कोर्ट के नालसा जजमेंट का सीधा उल्लंघन है। जो स्व-अनुभूत जेंडर पहचान का अधिकार देता है। नए बिल में जेंडर पहचान की मान्यता का अधिकार व्यक्ति से छीनकर सरकार से नियुक्त मेडिकल बोर्ड को दे दिया गया है। इससे ट्रांसजेंडर की परिभाषा केवल जैविक आधार तक सीमित हो जाएगी। कहा कि बिल केवल कुछ सांस्कृतिक समुदायों (जैसे हिजड़ा, किन्नर, अरावानी) तक पहचान को सीमित करता है, जिससे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला और नॉन-बाइनरी व्यक्ति अपने अधिकारों से वंचित हो जाएंगे। प्रेसवार्ता के दौरान ट्रांसजेंडर समुदाय की इन मांगों का डॉ. स्मृति गुप्ता ने भी पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने नए बिल की खामियों को उजागर करते हुए कहा कि एक व्यक्ति अंदर से कैसा महसूस करता है, यह सबसे ज्यादा अहम है। केवल शारीरिक अंगों के आधार पर आप किसी भी व्यक्ति को एक तय बॉक्स में फिट नहीं कर सकते हैं। मिसफिट ट्रांसजेंडर यूथ फाउंडेशन से शमन गुप्ता और वॉयस ऑफ वॉरियर फाउंडेशन से ओशिन सरकार ने एक सुर में सरकार से बिल को तत्काल प्रभाव से वापस लेने की अपील की है।

