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विधि विधान से खुले लाटू देवता मंदिर के कपाट

RNS INDIA NEWS 01/05/2026
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पुजारी ने आंखों पर पट्टी बांधकर गर्भगृह में प्रवेश किया

चमोली(आरएनएस)। वाण गांव स्थित सिद्धपीठ लाटू देवता मंदिर के कपाट शुक्रवार दोपहर दो बजे छह माह के लिए श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। पुजारी खेम सिंह ने आंखों पर पट्टी बांधकर गर्भगृह में प्रवेश किया। इसके बाद पूरा क्षेत्र जयकारों से गूंज उठा। इस वर्ष मंदिर समिति और ग्रामीणों ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए सदियों पुरानी बलि प्रथा को स्थायी रूप से प्रतिबंधित कर दिया है। शुक्रवार को कपाट खुलने से पहले मंदिर में अनुष्ठान और देवनृत्य का आयोजन हुआ। ग्रामीणों ने झोड़ा और चांछड़ी की प्रस्तुति दी। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचे और पूजा-अर्चना में भाग लिया। इसके बाद दोपहर दो बजे मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। पंडित उमेश चंद्र कुनियाल और रमेश चंद्र कुनियाल ने पूजा-अर्चना कराई। मान्यताओं के अनुसा, लाटू देवता को मां नंदा का भाई माना जाता है। हर साल अगस्त-सितंबर माह में श्री नंदा लोकजात यात्रा और हिमालयी महाकुंभ श्री नंदा राजजात यात्रा लाटू देवता की अगुवाई में होती है। इस अवसर पर नैनीताल हाईकोर्ट के न्यायाधीश सुभाष उपाध्याय, विधायक भूपाल राम टम्टा, जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत बिष्ट और मंदिर समिति के अध्यक्ष कृष्णा सिंह आदि उपस्थित रहे। पूर्व विधायक डॉ. जीतराम, प्रमुख तेजपाल रावत और प्रधान नंदुली देवी भी मौजूद रहे।
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बलि प्रथा पर लगाया प्रतिबंध: लाटू देवता मंदिर में पहले बलि प्रथा की परंपरा थी। मगर इस बार वाण के ग्रामीणों और मंदिर समिति ने बैठक कर इस प्रथा को हमेशा के लिए प्रतिबंधित करने का निर्णय लिया। समिति की अपील का असर दिखा और पहली बार मंदिर में कोई बलि नहीं दी गई। यह निर्णय सामाजिक और धार्मिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस पहल की स्थानीय समुदाय ने सराहना की।

मंदिर से जुड़ीं अनोखी परंपराएं: वाण लाटू मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए रहस्य बना हुआ है क्योंकि मंदिर के अंदर क्या है इसकी जानकारी किसी को नहीं है। गांव के लोग लाटू देवता को अपने इष्ट देवता के रूप में पूजते हैं और उनकी विशेष आस्था है। इस गांव की एक और विशेष परंपरा है कि यहां दुल्हन डोली से विदा नहीं होती है। यह परंपरा मां नंदा को डोली से हिमालय के लिए विदा करने की मान्यता से जुड़ी है। इसलिए यहां की दुल्हनें डोली में नहीं बैठतीं।

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