
देहरादून (आरएनएस)। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत उत्तराखंड के सभी प्राथमिक विद्यालयों को बालवाटिका से जोड़ने की तैयारी तेज हो गई है। प्रदेश के 11,580 प्राथमिक विद्यालयों में से वर्तमान में 5,585 विद्यालयों में बालवाटिका संचालित हो रही है। शेष विद्यालयों में भी इसे शुरू करने के लिए शिक्षा निदेशालय स्तर पर मैपिंग का काम किया जा रहा है।
खेल और गतिविधियों के जरिए होगा सीखना
बालवाटिका में तीन से आठ वर्ष तक की आयु के बच्चों को पारंपरिक पढ़ाई के बजाय खेल और विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से सीखने का अवसर मिलेगा। बच्चों में भाषा, अभिव्यक्ति और प्रारंभिक संख्या ज्ञान विकसित करने पर विशेष जोर दिया जाएगा। इसके लिए ‘जादू का पिटारा’ और ‘ई-जादू का पिटारा’ जैसी शिक्षण सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा।
शिक्षकों को दिया जा रहा प्रशिक्षण
बालवाटिका के प्रभावी संचालन के लिए शिक्षकों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। ‘जादू का पिटारा’ कार्यक्रम के जिला समन्वयक प्रणय बहुगुणा के अनुसार सीएसईआरटी की ओर से अब तक करीब 200 प्राथमिक शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। प्रशिक्षण में बच्चों की विकासात्मक जरूरतों को समझने, खेल और गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाने तथा भाषा विकास और बुनियादी संख्या ज्ञान के लिए शिक्षण सामग्री तैयार करने की जानकारी दी जा रही है।
शिक्षकों को स्थानीय और कम लागत वाली सामग्री से शिक्षण-अधिगम सामग्री तैयार करने के तरीके भी बताए जा रहे हैं, ताकि विद्यालयों में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सके।
अनुभव आधारित अधिगम पर जोर
बालवाटिका की अवधारणा में बच्चों के अनुभव को सीखने का आधार बनाया गया है। प्रशिक्षण के दौरान शिक्षकों को बताया जा रहा है कि बच्चे देखकर, सुनकर, छूकर, खेलकर, सवाल पूछकर और आपसी बातचीत के माध्यम से प्रभावी ढंग से सीखते हैं। इसी के तहत दैनिक गतिविधियों में बाल केंद्रित और अनुभवात्मक अधिगम को शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।
समग्र शिक्षा के तहत प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय को ‘जादू का पिटारा’ खरीदने के लिए धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है। इसका उद्देश्य प्री-प्राइमरी कक्षाओं के बच्चों को उनकी उम्र और सीखने की क्षमता के अनुरूप शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराना है।
सभी विद्यालयों तक विस्तार का लक्ष्य
शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के अनुसार राज्य के सभी प्राथमिक विद्यालयों को बालवाटिका से जोड़ने का काम चल रहा है। वर्तमान में करीब 50 प्रतिशत विद्यालयों में बालवाटिका संचालित हो रही है और लक्ष्य इसे शत-प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों तक विस्तारित करना है।

