

अल्मोड़ा। अल्मोड़ा लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन शास्त्रीय संगीत, आध्यात्मिकता, प्रकृति संरक्षण और कुमाऊं के ऐतिहासिक शैक्षिक परिदृश्य पर विभिन्न सत्र आयोजित किए गए। दिन की शुरुआत रवि जोशी की शास्त्रीय गायन प्रस्तुति से हुई। उन्होंने राग तोड़ी के साथ तुलसीदास और कबीर की रचनाओं पर आधारित सगुण एवं निर्गुण भजन प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। दिन का प्रमुख सत्र ‘प्रकृति से आंतरिक जागरूकता’ विषय पर आयोजित हुआ। रोमोला बुटालिया के संचालन में हुए इस सत्र में पीपल बाबा और स्वामी स्वप्रकाश ने विचार रखे। पीपल बाबा ने कहा कि मनुष्य अपने संघर्षों और इतिहास को भूलकर प्रकृति का विनाश कर रहा है, जिससे वह अपनी ही जीवन संभावनाओं को सीमित कर रहा है। वहीं आर्ट ऑफ लिविंग से जुड़े स्वामी स्वप्रकाश ने अपने जीवन के अनुभवों और मणिपुर में आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों के पुनर्वास के लिए किए गए कार्यों को साझा किया। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता केवल धार्मिक प्रथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने और उच्च चेतना के साथ जीवन जीने का माध्यम है। एक अन्य सत्र में ‘औपनिवेशिक काल में अल्मोड़ा एवं कुमाऊं हिमालय में शिक्षा’ विषय पर चर्चा हुई। अनिल के. जोशी, डॉ. हामिद और सुशील जोशी ने ब्रिटिश काल में क्षेत्र की शैक्षणिक स्थिति, मिशनरी स्कूलों के प्रभाव और शिक्षा संस्थानों के विकास पर विचार रखे। वहीं राहुल कोटियाल ने ‘बारहमासा’ नाम के पीछे की सोच और उत्तराखंड की मूल भावना पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखंड की छवि इस बात पर निर्भर करती है कि राज्य का अपना मीडिया क्या प्रस्तुत कर रहा है। उन्होंने उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की आवश्यकता पर भी जोर दिया। कार्यक्रम में आयोजन समिति अध्यक्ष वसुधा पंत, संयोजक विनायक पंत, मनीषा पंत, दीपक जोशी, मनोज गुप्ता, भूषण पांडे और रचित पंत सहित अन्य लोग मौजूद रहे।





