
अल्मोड़ा। जिला सहकारी बैंक अल्मोड़ा-बागेश्वर के चुनाव को अंतिम चरण में अचानक स्थगित किए जाने के बाद राजनीतिक और सहकारी हलकों में सवाल उठने लगे हैं। आधिकारिक तौर पर चुनाव स्थगित करने के पीछे आपदा को कारण बताया गया है, लेकिन सवाल यह है कि जब पूरे प्रदेश में सहकारी चुनाव प्रक्रिया जारी है, तो अल्मोड़ा में ही आपदा के कारण चुनाव क्यों रोकना पड़ा?
अल्मोड़ा-बागेश्वर के कुल 13 वार्डों में से 10 वार्डों में निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति बन चुकी थी। वहीं विशेष समितियों से भाजपा महानगर अध्यक्ष विनीत बिष्ट, श्वेता पंत तथा भाजपा के वरिष्ठ नेता की बहू कंचन टम्टा ने नामांकन दाखिल किया था। ऐसे में विशेष समितियों की सीटों पर भाजपा से जुड़े दावेदारों के बीच मुकाबला चर्चा का विषय बना हुआ था।
इधर धौलादेवी वार्ड में भाजपा के दो बड़े नेताओं के आमने-सामने होने से मुकाबला और दिलचस्प हो गया था। वहीं लमगड़ा वार्ड में भाजपा और कांग्रेस समर्थित दावेदारों के बीच मुकाबले की स्थिति बनी हुई थी।
नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद नामांकन पत्रों की जांच का चरण चल रहा था। इसी बीच जांच के दिन शाम करीब 7:30 बजे निर्वाचन स्थगित किए जाने की सूचना सामने आई। यही समय और परिस्थितियां अब राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गई हैं।
सवाल उठ रहा है कि यदि आपदा वास्तव में चुनाव स्थगित करने का प्रमुख कारण थी, तो क्या प्रदेश के अन्य जिलों में परिस्थितियां सामान्य थीं? यदि पूरे प्रदेश में सहकारी चुनाव कराए जा रहे हैं, तो अल्मोड़ा-बागेश्वर में ही निर्वाचन प्रक्रिया को रोकने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
दूसरा सवाल राजनीतिक समीकरणों को लेकर है। जहां 10 वार्ड निर्विरोध होने की स्थिति में थे, वहीं कुछ चुनिंदा सीटों पर भाजपा के ही नेताओं और समर्थित दावेदारों के बीच मुकाबला दिखाई दे रहा था। विशेष समितियों में विनीत बिष्ट, श्वेता पंत और वरिष्ठ भाजपा नेता की बहू कंचन टम्टा की दावेदारी, धौलादेवी में दो बड़े भाजपा नेताओं का आमना-सामना और लमगड़ा में भाजपा-कांग्रेस मुकाबला—इन परिस्थितियों ने चुनाव को सामान्य निर्वाचन से कहीं अधिक राजनीतिक बना दिया था।
हालांकि, चुनाव स्थगन को सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दबाव या अंदरूनी विवाद का परिणाम बताना अभी जल्दबाजी होगी। इसके लिए आधिकारिक आदेश और आपदा संबंधी वास्तविक परिस्थितियों की जांच जरूरी है। लेकिन चुनाव स्थगन की टाइमिंग और उससे पहले बने राजनीतिक समीकरणों ने सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
अब देखना होगा कि नई निर्वाचन तिथि कब घोषित होती है और क्या तब तक वर्तमान दावेदारियां और राजनीतिक समीकरण बरकरार रहते हैं।
पूरे प्रदेश में चुनाव, अल्मोड़ा में आपदा—संयोग है या सियासी समीकरणों का असर? यही सवाल फिलहाल सहकारी राजनीति के केंद्र में है।


