

अल्मोड़ा। जनजातीय गौरव दिवस के तहत विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में आयोजित कार्यक्रम में पर्वतीय कृषि के यंत्रीकरण, सौर ऊर्जा आधारित तकनीकों और स्थानीय नवाचारों पर किसानों के साथ चर्चा की गई। संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कान्त के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम में 10 जनजातीय किसानों ने प्रतिभाग किया। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से पर्वतीय कृषि में यंत्रीकरण की जरूरत और चुनौतियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि छोटे व बिखरे खेत, ढलानदार भूमि, विषम भौगोलिक परिस्थितियां तथा कृषि यंत्रों की उपलब्धता और संचालन में कठिनाई प्रमुख बाधाएं हैं। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड के अधिकांश पर्वतीय जिलों में कृषि शक्ति उपलब्धता एक किलोवाट प्रति हेक्टेयर से कम है। उन्होंने संस्थान द्वारा विकसित वीएल स्मॉल टूल किट, वीएल मल्च-कम-इनलाइन ड्रिप लेइंग मशीन, वीएल पैडी थ्रेशर, वीएल मिलेट थ्रेशर-कम-पर्लर, वीएल पॉलीटनल और वीएल सोलर ड्रायर की उपयोगिता बताते हुए कहा कि इनसे श्रम और समय की बचत के साथ उत्पादकता बढ़ाने तथा किसानों, विशेषकर महिलाओं की मेहनत कम करने में मदद मिल सकती है। चर्चा के दौरान बाम्पा गांव के हरीश नेगी ने दूरस्थ गांवों में पेट्रोल-डीजल आधारित यंत्रों की दिक्कतों को देखते हुए सौर ऊर्जा और बैटरी से चलने वाले कृषि यंत्र विकसित करने का सुझाव दिया। उन्होंने सोलर ड्रायर उपलब्ध कराने तथा गांव स्तर पर कृषि यंत्रों की मरम्मत के लिए दो-तीन लोगों को प्रशिक्षित करने का सुझाव दिया। गमशाली गांव की रुक्मिणी देवी ने सामूहिक सिंचाई के लिए सौर ऊर्जा संचालित पंप लगाने का सुझाव दिया। उन्होंने बताया कि इससे गांव के करीब 12-13 परिवारों को सिंचाई सुविधा मिल सकती है। एक किसान ने राजमा की सूखी डंठलों पर ऑयस्टर मशरूम उत्पादन का अनुभव साझा करते हुए मटर की डंठलों पर भी मशरूम उत्पादन की योजना बताई। उन्होंने नियंत्रित वातावरण में केसर और मशरूम उत्पादन को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. बृज मोहन पांडे ने किया। किसानों ने पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप कृषि तकनीकों के विकास और प्रसार पर जोर दिया।





