
न्यूयॉर्क। भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर नई चिंताएं सामने आई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत भारत के सामने यह शर्त रखी गई है कि वह रूस से कच्चे तेल की खरीद बंद करे और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका व वेनेजुएला पर निर्भर हो। चेतावनी दी गई है कि शर्त न मानने की स्थिति में भारत पर 25 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। इस दबाव के बीच आशंका जताई जा रही है कि यदि भारत इस दिशा में कदम बढ़ाता है तो घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं।
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और हाल के वर्षों में रूस उसका प्रमुख आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल तेल आयात का लगभग एक तिहाई हिस्सा रूस से आता रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि रूस से तेल की खरीद अचानक रोकना आसान नहीं होगा, हालांकि अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते इसमें कटौती की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। रिपोर्टों के मुताबिक, सरकारी रिफाइनरियां अब वेनेजुएला की ओर रुख कर रही हैं, जबकि निजी क्षेत्र की कुछ कंपनियों ने रूसी तेल की खरीद में कमी की है।
तकनीकी स्तर पर भी आपूर्तिकर्ता बदलना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। रूसी ‘यूराल क्रूड’ अपेक्षाकृत भारी और अधिक सल्फर युक्त होता है, जबकि अमेरिकी शेल ऑयल हल्का माना जाता है। भारत की कई रिफाइनरियां भारी ग्रेड के तेल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की गई हैं। ऐसे में अमेरिकी तेल के उपयोग के लिए मिश्रण और अतिरिक्त प्रसंस्करण की जरूरत पड़ेगी, जिससे लागत बढ़ सकती है।
आर्थिक दृष्टि से रूस भारत को कच्चे तेल पर उल्लेखनीय छूट देता रहा है। यह छूट कई बार 10 डॉलर प्रति बैरल से अधिक रही है। इसके विपरीत, अमेरिकी तेल की कीमत और लंबी शिपिंग लागत भारतीय रिफाइनरियों के लिए महंगी साबित हो सकती है। जानकारों का अनुमान है कि प्रति बैरल लागत में उल्लेखनीय वृद्धि होने पर इसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा। ऐसे में रूस से तेल आयात में कमी का सीधा असर देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

