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पलायन की भयावह हकीकत: अर्थी को कंधा देने के लिए बुलाने पड़े अर्धसैनिक बल, सरकारी दावों पर लगा सवाल

RNS INDIA NEWS 02/01/2026
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पिथौरागढ़। उत्तराखंड में पलायन की समस्या अब केवल आंकड़ों या रिपोर्टों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह गांवों के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ती हुई बेहद संवेदनशील स्थितियों तक पहुंच गई है। पिथौरागढ़ जिले से सामने आई एक घटना ने पलायन को लेकर सरकार के तमाम दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां एक बुजुर्ग महिला की अर्थी को कंधा देने के लिए गांव के बजाय अर्धसैनिक बल के जवानों की मदद लेनी पड़ी।

नेपाल सीमा से सटे तड़ीगांव में बीती 31 दिसंबर को 100 वर्षीय बुजुर्ग महिला झूपा देवी का निधन हो गया। परंपरा के अनुसार शव को अंतिम संस्कार के लिए काली नदी के तट तक ले जाना था, लेकिन गांव में इतने लोग ही नहीं बचे कि अर्थी उठाई जा सके। गांव में उस समय केवल चार-पांच बुजुर्ग मौजूद थे, जो शारीरिक रूप से इस कार्य में सक्षम नहीं थे।

मजबूरी में ग्रामीणों ने सशस्त्र सीमा बल से सहायता मांगी। सूचना मिलने पर एसएसबी के जवान मौके पर पहुंचे और उन्होंने न केवल अर्थी को कंधा दिया, बल्कि अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियों की व्यवस्था कर पूरे सम्मान के साथ अंत्येष्टि संपन्न कराई। झूपा देवी के 65 वर्षीय पुत्र रमेश चंद ने चिता को मुखाग्नि दी।

यह घटना किसी आपदा या युद्धग्रस्त क्षेत्र की नहीं, बल्कि उस पहाड़ी गांव की है, जहां हर चुनाव के दौरान विकास और पलायन रोकने के बड़े-बड़े वादे किए जाते रहे हैं। तड़ीगांव की यह स्थिति सरकारी योजनाओं और जमीनी सच्चाई के बीच गहरे अंतर को उजागर करती है।

ग्रामीणों का कहना है कि पलायन के पीछे सबसे बड़ा कारण बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। वर्ष 2019 में बनी कच्ची सड़क आज तक पक्की नहीं हो पाई है। जंगली सुअर खेती को पूरी तरह तबाह कर चुके हैं, जबकि गुलदार और भालू का डर हर समय बना रहता है। गांव में न तो स्वास्थ्य सुविधाएं हैं, न शिक्षा की समुचित व्यवस्था और न ही आजीविका के स्थायी साधन।

करीब दो दशक पहले तड़ीगांव में 37 परिवार रहते थे, लेकिन अब गांव सिमटकर केवल 13 परिवारों तक रह गया है। इनमें भी अधिकांश बुजुर्ग और बच्चे हैं। युवा पीढ़ी रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में गांव छोड़ चुकी है। खाली घर, बंद स्कूल और सूनी पगडंडियां अब गांव की पहचान बनते जा रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि आज हालात यह हैं कि बीमार को अस्पताल ले जाने वाला कोई नहीं बचा है और अंतिम यात्रा में कंधा देने के लिए भी गांव को बाहर से मदद लेनी पड़ रही है। यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है। यदि समय रहते सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार को लेकर ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में उत्तराखंड के सैकड़ों गांव इसी तरह खाली होते चले जाएंगे, जहां न जीने वाला बचेगा और न ही मरने पर कंधा देने वाला।

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