
कोटद्वार(आरएनएस)। एक ओर केंद्र सरकार छिपी खेल प्रतिभाओं को उभारने के लिए महत्वाकांक्षी योजना ‘खेलेगा इंडिया, बढ़ेगा इंडिया’ संचालित कर रही है। वहीं, जनप्रतिनिधियों और प्रदेश सरकार की उदासीनता के चलते क्षेत्र की खेल प्रतिभाएं दम तोड़ रही है। ढाई हजार की छात्र संख्या वाले पीजी कॉलेज कोटद्वार के पास अभी तक अपना खेल मैदान नहीं है। दरअसल खेल मैदान के लिए महाविद्यालय से सटी लैंसडौन वन प्रभाग की 0.93 हेक्टेयर भूमि का हस्तांतरण अभी तक नहीं हो पाया है। कोटद्वार और आसपास के पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं के लिए उच्च शिक्षा की सुविधा नहीं होने के कारण वर्ष 1976 में पीजी कॉलेज की स्थापना की गई। पूर्व में भवन के अभाव में बुद्धा पार्क के पीछे डिग्री कॉलेज का संचालन किया जाता था। बाद में शासन की ओर से लैंसडौन वन प्रभाग के कोटद्वार रेंज कार्यालय से सटी भूमि चयनित कर कॉलेज का भवन तैयार किया गया। कॉलेज का अपना खेल मैदान नहीं होने के कारण वर्ष 1998 में शासन की ओर से एक हेक्टेयर भूमि खेल मैदान के लिए उपलब्ध कराई गई लेकिन भूमि खेल मैदान के लिए पर्याप्त नहीं थी जिससे आधा-अधूरा मैदान ही तैयार हो पाया। तब उम्मीद थी कि वन विभाग जल्द ही अवशेष 0.93 हेक्टेयर वन भूमि भी महाविद्यालय प्रशासन को हस्तांतरित कर देगा, लेकिन जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के चलते 25 साल भी उक्त चयनित वन भूमि का हस्तांतरण नहीं हो पाया है। खेल के मैदान के लिए वन भूमि के हस्तांतरण को राजस्व और वन विभाग की संयुक्त टीमें दो बार सर्वे कर चुकी हैं, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। वर्तमान में नगरीय पेयजल योजना के तहत पाइप लाइन बिछाने के कार्य व महाविद्यालय में छात्रावास का निर्माण कार्य के चलते मैदान की स्थिति और भी दयनीय हो गई है। छात्र-छात्राएं अभ्यास के लिए कॉलेज से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित राजकीय स्पोर्ट्स स्टेडियम पर निर्भर हैं। छात्रसंघ अध्यक्ष विकास कुमार का कहना है कि वन भूमि का हस्तांतरण होने पर महाविद्यालय में खेल मैदान व 400 मीटर का एथलीट ट्रेक बन सकेगा। इसके लिए पूर्व में लैंसडौन आगमन के दौरान मुख्यमंत्री को ज्ञापन भी सौंपा गया था।

