जोशीमठ आपदा भूगर्भीय जलीय चट्टानी पर्त में दरार का नतीजा : पर्यावरण विशेषज्ञ झा

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फरवरी 2021 में हुई चमोली फ्लैश फ्लड की घटना हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र से छेड़छाड़ का स्पष्ट उदाहरण

देहरादून। उत्तराखंड सरकार का कहना है कि मीडिया को जोशीमठ की रिपोर्टिंग में सावधानी बरतनी चाहिए। वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ जोशीमठ को लेकर जो बातें कह रहे हैं वो बड़े खतरे का संकेत करती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ विमलेन्दु झा शहर की दुर्दशा की वजह एनटीपीसी के इंजीनियरों को मानते हैं। उनका कहना है कि यहां प्रकृति को जितना बड़ा नुकसान पहुंचाया गया है उसकी मरम्मत की अब गुंजाइश नहीं बची है। जोशीमठ आपदा भूगर्भीय जलीय चट्टानी पर्त में दरार का नतीजा है। सनद रहे केंद्रीय टीमों ने भी इसकी आशंका जताते हुए भूमिगत जल जमाव वाले सटीक स्थान का पता लगाए जाने का सुझाव दिया था।
माना जा रहा है कि जिस जगह पर भूगर्भीय जलस्रोत मौजूद है वह इलाका जोशीमठ में ही है। केंद्रीय अधिकारियों ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से इस जगह की सटीकता का पता करने के लिए भूगर्भीय सर्वेक्षण कराए जाने की सिफारिश की थी। पर्यावरण विशेषज्ञ विमलेन्दु झा ने अपने सिलसिलेवार ट्वीट में कहा- जोशीमठ आपदा एनटीपीसी के इंजीनियरों की गलती के कारण आई है। जोशीमठ के नीचे टनलिंग के दौरान टनल-बोरिंग मशीनों से भूगर्भीय जलीय चट्टानी पर्त में छेद हो गया। जोशीमठ आपदा इसी का नतीजा है।
विमलेन्दु झा ने कहा- हर मिट्टी सादी मिट्टी नहीं होती है। हर मिट्टी खुदाई, टनलिंग और विस्फोट के लिए उपयुक्त नहीं होती है। जोशीमठ की जमीन भी ऐसी ही है। हिमालय उच्च भूकंपीय क्षेत्र में स्थित है। यह सबसे कम उम्र की पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। हिमालय चरम जलवायु घटनाओं से घिरा इलाका है। फरवरी 2021 में हुई चमोली फ्लैश फ्लड की घटना इसी परियोजना स्थल पर हुई थी। यह हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र से छेड़छाड़ का एक स्पष्ट उदाहरण है। राजनीतिक दल और अधिकारी अल्पकालिक लाभ के लिए कंपनियों को हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र से छेड़छाड़ करने की खुली छूट देते हैं।

विशेषज्ञ तो आगाह कर सकते हैं, अमल तो सरकारों को करना है
जोशीमठ के बाद, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग आदि जगहों पर भी घरों में दरारें नजर आ रही हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ विमलेन्दु झा कहते हैं कि यह कोई संयोग नहीं है। भूधसाव वाली सभी जगहें या तो चार धाम सड़क परियोजना या किसी रेल सुरंग क्षेत्र या किसी पनबिजली परियोजना के करीब हैं। अब सरकारें कह रही हैं कि विशेषज्ञ आपदाओं की वजहों का पता लगाएंगे। पर्यावरणवादी चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं कि विशेषज्ञ क्या कर सकते हैं। एक के बाद एक तमाम अध्ययन हुए हैं। ये अध्ययन तब तक मदद नहीं करेंगे जब तक कि सरकारें विशेषज्ञों के सुझावों पर अमल नहीं करतीं।

भूस्खलन से सुरंग का कोई लेना-देना नहीं: एनटीपीसी
वहीं एनटीपीसी ने कहा है कि उसकी तपोवन विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना की सुरंग का जोशीमठ में हो रहे भूस्खलन से कोई लेना-देना नहीं है। जैसा की तपोवन विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना की सुरंग को जोशीमठ में जमीन धंसने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। एनटीपीसी की सुरंग जोशीमठ कस्बे के नीचे से नहीं गुजर रही है। धौलीगंगा नदी पर बनाई जा रही परियोजना पर भी कंपनी इस समय कोई विस्फोट कार्य नहीं कर रही है। सुरंग का जोशीमठ कस्बे में हो रहे भूस्खलन से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि लोग भी एनटीपीसी को ही कोस रहे हैं।

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