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  • सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ऐतिहासिक व विरोधियों के मुँह पर तमाचा- रवि रौतेला, जिलाध्यक्ष भाजपा
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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ऐतिहासिक व विरोधियों के मुँह पर तमाचा- रवि रौतेला, जिलाध्यक्ष भाजपा

RNS INDIA NEWS 30/10/2020
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अल्मोड़ा।30/10/20

भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष रवि रौतेला ने आज एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कल ऐतिहासिक निर्णय दिया और उत्तराखंड के बेदाग मुख्यमंत्री के पक्ष में फैसला सुनाया जिसमे सी बी आई जाँच की मांग पर रोक लगाकर माननीय मुख्यमंत्री को राहत दी वरन उन लोगो के मुँह में करारा तमाचा भी मारा है जो माननीय मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिह रावत के खिलाफ माहौल बनाने में लगे है ये वही लोग है जिनके गैरकानूनी काम भाजपा शासन में नही हो पा रहे है और माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर हैरानी जताकर यह संदेश भी दिया कि कानून निष्पक्ष अपना कार्य करता है, मुख्यमंत्री के पक्ष को सुने बगैर हाईकोर्ट के सख्त आदेश से सब हैरान है क्योंकि उक्त पत्रकारों की याचिका में मुख्यमंत्री रावत के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध भी नही किया गया था हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग शुरू हो गयी है यह आदेश सी एम को सुने बगैर दिया गया ।इस तरह का आदेश निर्वाचित सरकार को अस्थिर करेगा और पक्षकार को सुने बगैर क्या स्वतः ऐसा आदेश दिया जा सकता है इस पर विचार करना चाहिए, और उक्त व्यक्तियों के खिलाफ पूर्व में भी कई मामले चल रहे है और स्टिंग करके सरकारों को ब्लैकमेल करने का धंधा काफी पुराना है लेकिन सुप्रीम कोर्ट का आदेश विरोधियों के खिलाफ जोरदार तमाचा है
आरोप लगाया जाता है कि 2015-16 में झारखंड के बीजेपी प्रभारी रहते हुए उन्होंने वहां के एक व्यक्ति से 25 लाख रुपये की रिश्वत अपने नाते रिश्तेदारों के बैंकखातों के जरिये ली। इस मामले की एसआईटी जाँच में इन आरोपों को निराधार पाया गया है। उल्टा, इस मामले में हरेंद्र रावत नाम के जिस व्यक्ति की पत्नी के खाते में पैसा डाले जाने के आरोप लगाए गए थे, उसने ही नेहरू कॉलोनी थाने में आरोप लगाने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया था। इस मुकदमे में हाईकोर्ट का फैसला आया। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने कोर्ट के सीबीआई जांच वाले आदेश का सम्मान करने की बात कही है। कोर्ट के इस आदेश से जांच होने पर दूध का दूध-पानी का पानी हो जाएगा

लेकिन ये भी सोचना होगा कि निजी स्वार्थ के चलते कैसे कुछ राजनेता और भ्रष्टाचारी प्रदेश की छवि तक दांव पर लगा देते हैं। यह सोचने का विषय है कि 5 साल पुराने ऐसे मामले में जो उत्तराखंड में घटित नहीं हुआ उसके बूते कैसे उत्तराखंड में सियासी अस्थिरता फैलाने की कोशिशें हो रही हैं। उस समय त्रिवेंद्र भाजपा के झारखण्ड प्रभारी थे। सवाल यह है कि जब तक त्रिवेन्द्र मुख्यमंत्री नहीं थे तो तब तक ये मुद्दा क्यों नहीं उठाया गया। तब उनके खिलाफ झारखंड या उत्तराखंड में मुकदमा दर्ज क्यों नहीं किया गया। उस वक़्त तो वे सीएम नहीं थे, आसानी से उन पर कार्रवाई हो सकती थी। ऐसा इसलिये नहीं किया गया क्योंकि त्रिवेन्द्र के खिलाफ पुलिस कार्रवाई नहीं बल्कि उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाना असल मकसद है।

उत्तराखंड की कमान फिर से भ्रष्टाचारियों को सौंपना इनका उद्देश्य है। इस प्रकार की साजिश से उत्तराखंड सुर्खियों में है। राज्य की छवि दांव पर है।विपक्ष ने जनता के मुद्दे हाशिये पर रखे हैं लेकिन विपक्ष केवल और केवल राजनीति कर रहा है जो उत्तराखंड के भविष्य के लिए सही नही है और जनता ये जानती है और 2022 के चुनावों इसके गंभीर परिणाम विपक्ष को भुगतने होंगे।

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