
अल्मोड़ा। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल की कार्यप्रणाली पर कुछ परियोजना कर्मचारियों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस वार्ता में एनएमएचएस पीएमयू में कार्यरत डॉ. पुष्कर सिंह और उनके सहयोगियों ने कहा कि समाज को संस्थान की कार्यप्रणाली के बारे में आगाह करने के उद्देश्य से उन्होंने अपनी बात सार्वजनिक की है। उन्होंने बताया कि वे एनएमएचएस जैसे राष्ट्रीय मिशन में करीब एक दशक से कार्य कर रहे हैं और इस दौरान सीमित वेतन बढ़ाने से लेकर स्थायीकरण तक की कोई मांग नहीं की गई।
वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2024 से एनएमएचएस के पुनर्गठन की चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन उन्हें कभी आधिकारिक रूप से इसकी जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने बताया कि 11 हिमालयी राज्यों की 200 से अधिक परियोजनाओं का काम करीब 11 कर्मचारी संभाल रहे थे। उनके अनुसार वर्ष 2024 में अनुभवहीन नेतृत्व के कारण एनएमएचएस की स्थिति खराब हुई। करीब एक माह पूर्व एनएमएचएस की ओर से पुनर्गठन को लेकर विज्ञप्ति जारी की गई, जिसमें निर्धारित योग्यताओं को उन्होंने अव्यावहारिक बताते हुए विरोध किया और कई जनप्रतिनिधियों को भी इसकी जानकारी दी।
वक्ताओं ने बताया कि मंत्रालय की संयुक्त सचिव नमिता प्रसाद के समक्ष निदेशक की मौजूदगी में उन्हें सकारात्मक आश्वासन दिया गया था। इसके बाद ऑनलाइन साक्षात्कार लिए गए, लेकिन इस दौरान सभी कर्मचारियों को बिना कारण नोटिस देकर बाहर कर दिया गया। हाल में जारी परिणामों में उनके अनुसार अनेक अनुभवहीन और अयोग्य लोगों के चयन से परियोजना कर्मचारी आहत हैं। उन्होंने बताया कि इससे पूर्व परियोजना स्टाफ का एक समूह न्यायालय में जाकर न्याय की मांग कर रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि परियोजना स्टाफ की भर्ती में डीओपीटी के नियमों का पालन नहीं किया गया और यह भी नहीं देखा गया कि गैर हिमालयी राज्यों के अनुभवहीन लोगों के माध्यम से मिशन का संचालन किस प्रकार किया जाएगा। वक्ताओं ने नोडल अधिकारी एमएस लोधी और निदेशक आईडी भट्ट पर लापरवाही करने तथा स्वजनों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से प्रक्रिया तैयार करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जिस मानदेय में वे वर्षों से काम कर रहे थे, उसी काम के लिए नए परियोजना स्टाफ को चार गुने मानदेय का भुगतान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि करीब एक दशक पहले वे भी विज्ञप्ति और साक्षात्कार के माध्यम से योग्यता के आधार पर इन पदों पर नियुक्त हुए थे।
वक्ताओं ने बताया कि दो पीड़ितों ने इस संबंध में अनुसूचित आयोग से शिकायत की है और न्यायालय में भी लंबी लड़ाई लड़ने की चेतावनी दी है। उन्होंने संस्थान के कुछ वैज्ञानिकों पर शोध के नाम पर बड़े भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप लगाया। वक्ताओं ने कहा कि जरूरत पड़ी तो वे एक दशक के दौरान विज्ञान और अनुसंधान के नाम पर हुई गतिविधियों से जुड़े मामलों को सामने लाएंगे और यह भी बताएंगे कि हिमालयी राज्यों के आंकड़ों तथा संस्थान को उपलब्ध जनता के पैसे के साथ कितना न्याय किया गया।
उन्होंने बुद्धिजीवियों, लेखकों, पत्रकारों और वैज्ञानिकों से संस्थान की कार्यप्रणाली पर आंख मूंदकर भरोसा न करने की अपील की। साथ ही केंद्रीय जांच एजेंसियों तक संस्थान में कथित भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को ले जाने की बात कही। वक्ताओं ने परियोजनाओं के पैसे की कथित बंदरबांट, अयोग्यता को योग्यता साबित करने तथा वर्षों से अपने अनुसंधान क्षेत्रों में नहीं जाने के बावजूद वेतन लेने वाले वैज्ञानिकों से जुड़े मामलों की जांच की मांग की।
वक्ताओं ने कहा कि यदि मंत्रालय में कुछ लोगों की मिलीभगत नहीं है तो पुनर्गठन संबंधी विज्ञप्ति को तत्काल निरस्त कर पारदर्शी तरीके से एनएमएचएस का संचालन किया जाए और योग्य व्यक्ति को नोडल बनाया जाए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संस्थान किसी परमाणु कार्यक्रम या रक्षा अनुसंधान पर काम नहीं करता, फिर भी कर्मचारियों को नियुक्ति से पूर्व ब्रिटिशकालीन ऑफिसियल एक्ट के नाम पर बांड भरवाकर नियुक्ति दी जा रही है। उन्होंने मीडिया को अक्सर संस्थान के अनुसंधान कार्यक्रमों से दूर रखने का भी आरोप लगाया।
वक्ताओं ने कहा कि स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच कराकर उनके आरोपों की पुष्टि की जा सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोविंद बल्लभ पंत की विरासत से जुड़े संस्थान का वर्तमान नेतृत्व उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रहा है और संस्थान का आंतरिक प्रबंधन लगातार कुप्रबंधन का शिकार हो रहा है। इस अवसर पर संचार सहायक डॉ. पुष्कर सिंह, आईसीटी हेड अरविंद कुमार और प्रोजेक्ट असिस्टेंट आईटी गौरव कुमार आदि मौजूद रहे।


